1 पिच्छुसे फिर के समुन्द्रके किनारे बा शिक्षा देनलागो। बाके चारौघेन भीड़ यितनो भरी रहए की बा समुन्द्र में भई एक नैयाँमे चढो और बामे बईठगव । आदमी समुन्द्र के किनारेके ढाहोमे बईठेरहयँ। 2 और बा उनके कहानी में बहुत बात सिखाई। बा अपनो शिक्षामे उनसे आईसे कही: 3 "सुनओ 'देखओ, एक आदमी बीज बोनके निकरो।" 4 और बोत पेती कुछ बीज डगर में पडे और बे बीज चिरैचुरगनि आएके खाए डारीं। 5 कुई बीज पत्थर बारे ठाँउमें पडे, जहाँ बहुत मट्टी न रहए, और मट्टीकी गहेराई न हुईके, बे जल्दी जमिगए। 6 घामु एक्दम जोडसे नीकरो और पीछू पिङगा डुङ्गए, जर न हुइके बे अइल्याए गय। 7 कुई बीज काँटोन के बिचमे पडे। काँटो बढो और पेंड बाँझे हुइगए, और बामे फरा न लगे। 8 पर कोई बीज अच्छी जमिनमे पडे, और जमे और बढके तीस गुना, साठ गुना, और सय गुना फरा दईं। 9 और बा कहि, “जौनको सुनन बारो कान हए, बा सुनए।” 10 जब बा इकल्लो भव, तओ बाहृ जनी चेला और बाके आसपास भए, बे बासे कहानीके बारेमे पूछीं। 11 बा उनसे कहि, “परमेश्वरको राजको भेद तुमके दओगव हए, पर बाहिर बारेनसे सब कहानीमें कहोजात है। 12 कि बे देखन त देखत हएँ, पर देख न पात् हएँ, सुनन् त सुनत् हएँ, पर समझ न पातहएँ, नत् बे पश्चाताप करते,और बिनको पाप क्षमा हुईतो।” 13 बा उनसे कही, “तुम जा कहानीको अर्थ न समझे ? तव और सब कहानीको अर्थ कईसे समझैगे ? 14 बीज बोनबारो वचन बोत् हय। 15 कोई आदमी डगर में बोए भए बीज जइसे हएँ। जब बे वचन सुनत् हएँ, तव तुरन्त शैतान आत् हए और बिनमे बोओ भव वचन लैचलो जात् हए। 16 अइसि करके पत्थर बारे ठाँउमे बोए भए जेहि हएँ, जौन जब वचन सुनत् हएँ, तव खुशीसे तुरन्तै बे ग्रहण करलेत् हयँ। 17 तव उनको अपनो जर नलगनके कारन थोरी देर तक बे टिकत् हएँ। तव जब वचन को कारण संकट औ सताबट आत् हए, तओ बे तुरन्त गिर जात् हएँ। 18 काँटोके बिचमे बोए भए जेहिं हएँ, जौन वचन सुनत् हयँ, 19 पर जा संसारको चिन्ता और धनको लोभ और चीजको लालच आएके वचनके दबाए देत् हए, तव बे फरत न हयँ। 20 तव अच्छी जमिनमें बोए भए जेहि हएँ, जौन वचन सुनत हएँ, और ग्रहण करत् हएँ, और फरा देत् हएँ तीस गुना, साठ गुना, और सय गुना।” 21 बा उनसे कहि, “का कुई दिया पजारके खटीया तरे धरन के ताँहि भीतर लात हएँ? का आरेम धारन ताहिं न ? 22 कुई चीज लुकाएके न धर पएहएँ, जौन जानि न जाबए, और कौन चीज है जौन उजियारोमे न लयहयँ। 23 अगर कूई आदमीक सुननबारो कान हए, तव बा सुनए।” 24 बा उनसे फिर कहि, “तुम जो सुनत हौ, बामे ध्यान देओ। काहेकि जौन नापसे तूम देहौ, बहे नापसे तुम पैहौ। और तुमके और जद्धा दओ जएहए। 25 काहेकी जौनके सँग हए, बाके दओ जएहय, और जौन सँग न हय, बाके सँग भव फिर छिनो जएहए।” 26 बा कहि, “परमेश्वरको राज अईसो हए- कोई एक आदमी जमीनमे बीज बोत हय, 27 और बा सोए से फिर, जगे से फिर रातदिन बा बीज जमत हय और बढतहय, तव बा कईसे बढत है, बा न जानत हय। 28 जमीन अपनए जमात् हय, पहिले पिङ्गा तव बाली, तव बालीमें पुरा दाना लागत हय। 29 तव जब अन्न पकत् हए, तव तुरन्तए बा हँसिया लगात हए काहेकी फसलको बेरा आएजात हए।” 30 बा फिर कहि, “परमेश्वरको राजको तुलना का के सँग करयें ? तव कौन कहानी से जाको बयान करयें ? 31 जा त भादीक दाना जैसो हए, जो जमीनमें बोत् हएँ | पृथ्वीभरमे सब बीजसे छोटो हए तहुँ फिर, 32 जब बा बोत् हएँ, तव बा बढत् हए, और सब सागपातसे बड़ो, और बाके बडे बडे हाँगा होत हएँ, और आकाशके पन्छी बाके छाहींमे घरघुस्ला बनात् हँए।” 33 बिनके समझन बारी बा अईसी बहुत कहानी कहिके उनके वचन सुनाई। 34 कहानी बिना बा उनसे न बोली, तव अपने चेलनके बा चुप्पए सबको अर्थ खोलदै। 35 "बा दिन सन्झाके बा चेलान से कहि, ""आबौ, हम बोपार जामएँ।” 36 तव भीड़से बिदा लैके पीच्छू, बा जौन नैयाँमे बैठो रहए बहेमें चेला बाके अपने सँग लैगय। और फिर नैयाँ बाकेसँग रहयँ। 37 और बहुत भारी आँधी चली, और लडुरा नैयाँमें लणन लगे, हियाँ तक कि नैयाँमें पानी भरन लागो। 38 बा अपना नैयामें पिच्छुके भागमे एक सिरहींन लैके सोतरहए। बे बाके अइसे करके जगाईं, “गुरुज्यू हम डूबन लागे का तुमए चिन्ता न हय ?" 39 तव बा जगो, और आँधीके डाँटी, और समुन्द्रको लडुरासे कही, “शान्त हो और थमिजा।“ और आँधी थमीगै और शान्त हुईगओ। 40 बा उनसे कहि, “तुम अईसे काहे डरात् हौ ? तुमर बिश्बास न हय ?" 41 तव बे बहुत डराई गए और आपसमे कहन लागे, “जा कौन हए ? आँधी और समुन्द्र फिर ईनको हुकुम मानत हएँ।”